• वृन्दावन - राधा-कृष्ण की दिव्य प्रेममयी भूमि

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    वृंदावन यमुना के तट पर विराजमान है। वृंदावन का नात जिहवा पर आते ही मन पुलकित हो उठता है और श्री कृष्ण के प्रेम को आतुर मन भावविभोर हो जाता है। नटखट श्री कृष्ण की मनोहारी छवि आंखों के सामने सम्मुख हो जाती है। वृंदावन में उन्होनंे अनेकों लीलाएं की है जिसका वर्णन सभी को ग्रन्थों में मिलता है और यहां आते ही वो सारी लीलाएं आंखों के सामने घूमने लगती है जिस से मन भक्ति भावना तथा श्रद्धा से नतमस्तक हो जाता है। वृंदावन धाम ब्रज का हृदय है जहां भगवान ने अपना बचपन बिताया है और सभी को मन मोहने वाली छवि के दर्शन करवाएं है। पद्म पुराण में वृंदावन धाम को भगवान श्री कृष्ण का साक्षात शरीर व उनको सुख प्रदान करने वाला स्थान बताया गया है। इसी वजह से भक्तों में वृंदावन के प्रति अटूट श्रद्धा, प्रेम व विश्वास देखा जाता है। सभी हमेशा ललायित रहते हैं ब्रज धाम में आने के लिए। 

     मीराबाई ने वृंदावन का वर्णन कुछ इस तरह से किया है
             आली मोहे लागै वृंदावन नीकौ।
             घर घर तुलसी ठाकुर पूजा, दरसण गोविंद जी को
             निरमल नीर बहत जमुना को, भोजन दूध दही कौ।
             रतन सिंहासण आप विराजै मुकुट धरयो तुुलसी को।।
             कुंजन कुंजन फिरत राधिका शब्द सुनत मुरली को।
              मीरा के प्रभु गिरधर नागर, भजन बिना नर फीको

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    बांके बिहारी का मंदिर बहुत ही सुंदर बना हुआ है बाहर से देखने मात्र से ही ऐसा अनुभव होता है जैसे आप किसे राजा महाराजा के महल में आ चुके हैं और ऐसा लगे भी क्यों ना बांके बिहारी तो है ही वो जो हमारे दिलों पर राज करते हैं और हम से प्रेम करते हैं।  ऐसी मान्यता है की जो भी भक्त बांके बिहारी जी के चरणों में शरणागत हो जाता है उनको बांके बिहारी अपनी शरण में ले लेते हैं और उसपर कृपा बरसने लगती है।

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    बांके बिहारी मंदिर के पुजारी जी के अनुसार बिहारी जी रात्रि के समय निधिवन में रास रचाने के लिए जाते है इसीलिए उनको सुबह मंगल आरती के लिए नहीं उठाया जाता जिससे की उनकी नींद को खराब ना किया जाए बल्कि सुबह 8 बजें दर्शन आरती के समय उठाया जाता है। केवल जन्माष्टमी के पावन दिन ही बांके बिहारी जी को मंगल आरती के समय उठाया जाता है, अक्षत तृतीय के शुभ दिन बिहारी जी के चरण दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होता है, शरदपूर्णिमा के दिन वो वंशी धारण करते हैं और श्रावण माह में आने वाली तीज पर झूले पर बैठते हैं। बांके बिहारी जी अपने भक्तों से बहुत ही प्रेम करते हैं और उनको सुख व सौभाग्य का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। आप वृंदावन जाएं तो आप देखेंगे की बांके बिहारी जी वहां अपने भक्तों को प्रसन्नता देने के लिए अनेकों चमत्कार करते रहें हैं।

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     एक बार हरिदास जी प्रात शोच के लिए गए और जब वापिस आए तो उन्होनें देखा की उनके बिस्तर पर कोई सो रहा है, वृद्ध होने की वजह से वो ना पहचान सकें की उनके बिस्तर पर बिहारी जी ही आकर सो गए है उन्होनें जैसे ही बोला की कौन सो रहा है तो बांके बिहारी जी वहां से भाग गए और अपना चूड़ा और वंशी वहीं भूल गए और उधर जैसे ही मंदिर में पूजारी जी ने कपाट खोला तो देखा की चूड़ा और वंशी गायब है तो वो स्वामी जी के पास निधिवन में आए और उनको आकर सारी बात बताई तब स्वामी जी ने देखा की उनके पलंग पर चूड़ा और वंशी विराजमान है। कुछ ऐसे नटखट और रसमयी है हमारे बांके बिहारी जी जो अपने भक्तों के साथ प्रेम का आदान प्रदान करने से कभी नहीं चूकते। भक्त भी बांके बिहारी जी के साथ एक अटूट प्रेम की अनूभुति करते हैं और उन पर अटूट विश्वास करते हैं।